History notes

History notes : ऋग्वैदिक काल से पहले आर्यों का मुख्य व्यवसाय क्या था ? उनके आर्थिक जीवन और आजीविका के प्रमुख साधनों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए…..

History notes : ऋग्वैदिक काल से पहले तथा प्रारंभिक ऋग्वैदिक काल में आर्यों का मुख्य व्यवसाय पशुपालन था। उस समय उनका जीवन मुख्यतः गौ-पालन, घोड़े, भेड़, बकरी तथा अन्य पालतू पशुओं पर आधारित था। आर्य समाज पूर्णतः स्थायी कृषि समाज नहीं था, बल्कि अर्ध-घुमंतू (Semi-Nomadic) जीवन व्यतीत करता था। उनके लिए गाय केवल दूध देने वाला पशु नहीं थी, बल्कि धन, समृद्धि, प्रतिष्ठा और आर्थिक शक्ति का प्रमुख प्रतीक भी थी। किसी व्यक्ति की समृद्धि का आकलन उसके पास उपलब्ध गायों की संख्या से किया जाता था। यही कारण है कि ऋग्वेद में गाय को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है तथा “गो” शब्द का अनेक बार उल्लेख मिलता है।

History notes : ऋग्वैदिक काल से पहले आर्यों का मुख्य व्यवसाय क्या था……

आर्यों के आर्थिक जीवन का सबसे प्रमुख आधार पशुपालन था। वे गाय, बैल, घोड़े, भेड़ और बकरियों का पालन करते थे। इन पशुओं से उन्हें दूध, घी, दही, ऊन, चमड़ा तथा परिवहन के साधन प्राप्त होते थे। बैलों का उपयोग भार ढोने और बाद के समय में कृषि कार्यों के लिए भी किया जाने लगा। History notes घोड़े युद्ध तथा रथ संचालन में अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते थे। पशुधन की रक्षा करना तथा उसे बढ़ाना प्रत्येक परिवार का प्रमुख उद्देश्य था। कई बार पशुओं को लेकर विभिन्न जनजातियों के बीच संघर्ष भी होते थे, जिन्हें “गविष्टि” कहा गया है।

यद्यपि पशुपालन प्रमुख व्यवसाय था, फिर भी कृषि का प्रारंभिक विकास भी हो चुका था। आर्य जौ (यव) तथा कुछ अन्य अनाजों की खेती करते थे। कृषि उस समय सीमित स्तर पर होती थी और वर्षा पर अधिक निर्भर थी। बाद के उत्तर वैदिक काल में कृषि का महत्व बढ़ता गया, किंतु ऋग्वैदिक समाज में यह अभी गौण व्यवसाय था।

आर्यों के आर्थिक जीवन में History notes शिकार, वनोपज संग्रह तथा हस्तशिल्प का भी सीमित योगदान था। वे लकड़ी, धातु, चमड़े तथा ऊन से उपयोगी वस्तुएँ बनाते थे। बढ़ई, रथ निर्माता, कुम्हार, धातुकार तथा बुनकर जैसे कारीगर समाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। वस्तुओं का विनिमय मुख्यतः वस्तु-विनिमय प्रणाली (Barter System) के माध्यम से होता था, क्योंकि उस समय नियमित सिक्का प्रचलन में नहीं था। गाय स्वयं एक प्रकार की विनिमय इकाई के रूप में प्रयुक्त होती थी।

आर्य समाज में व्यापार का स्वरूप भी प्रारंभिक अवस्था में था। वे स्थानीय स्तर पर वस्तुओं का आदान-प्रदान करते थे। History notes नदियों के माध्यम से सीमित व्यापार होता था तथा कुछ व्यापारी दूर-दराज़ क्षेत्रों तक भी जाते थे। व्यापार का उद्देश्य मुख्यतः आवश्यक वस्तुओं की पूर्ति करना था, न कि बड़े पैमाने पर लाभ अर्जित करना।

इस प्रकार स्पष्ट होता है कि ऋग्वैदिक काल से पहले तथा प्रारंभिक ऋग्वैदिक काल में आर्यों का मुख्य व्यवसाय पशुपालन था। History notes कृषि, हस्तशिल्प, शिकार, वनोपज संग्रह तथा प्रारंभिक व्यापार उनके आर्थिक जीवन के सहायक साधन थे। पशुधन उनकी संपत्ति, सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक समृद्धि का सबसे बड़ा आधार था, जबकि कृषि धीरे-धीरे विकसित होकर आगे चलकर भारतीय समाज की प्रमुख आर्थिक गतिविधि बन गई।