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Upsc History Notes Hindi : सविनय अवज्ञा आंदोलन क्या था? इतिहास, कारण, दांडी मार्च और प्रभाव…

Upsc History Notes Hindi : सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक प्रमुख जन-आंदोलन था, जिसे महात्मा गांधी ने 1930 में शुरू किया। इस आंदोलन का उद्देश्य ब्रिटिश सरकार के अन्यायपूर्ण कानूनों का शांतिपूर्ण तरीके से उल्लंघन करना और भारत को पूर्ण स्वतंत्रता दिलाने के लिए दबाव बनाना था।

इस आंदोलन की शुरुआत 6 अप्रैल 1930 को दांडी में नमक कानून तोड़ने के साथ हुई। गांधीजी ने 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से दांडी मार्च शुरू किया था। History Notes इस आंदोलन में नमक कानून तोड़ने के अलावा विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, कर न देना और अन्य औपनिवेशिक कानूनों का अहिंसक विरोध भी शामिल था।

सविनय अवज्ञा आंदोलन क्या था? History Notes

सविनय अवज्ञा का अर्थ है—अन्यायपूर्ण कानूनों का जानबूझकर, खुले तौर पर और अहिंसक तरीके से उल्लंघन करना।

गांधीजी का मानना था कि यदि कोई कानून अन्यायपूर्ण है, तो जनता सत्य और अहिंसा के आधार पर उसका विरोध कर सकती है। इसी विचार के तहत भारतीयों से ब्रिटिश सरकार के कुछ History Notes कानूनों को मानने से इनकार करने की अपील की गई।

आंदोलन के प्रमुख तरीके थे:

  • नमक कानून तोड़ना।
  • विदेशी कपड़ों और वस्तुओं का बहिष्कार करना।
  • कुछ क्षेत्रों में भूमि-राजस्व और अन्य करों का भुगतान न करना।
  • औपनिवेशिक वन कानूनों का विरोध करना।
  • शांतिपूर्ण जुलूस, सभाएं और धरने आयोजित करना।
  • स्वदेशी वस्तुओं और खादी को बढ़ावा देना।
सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने के प्रमुख कारण History Notes
1. पूर्ण स्वराज की मांग

दिसंबर 1929 में लाहौर में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की। इस अधिवेशन में पूर्ण स्वराज (Purna Swaraj) को कांग्रेस का लक्ष्य घोषित किया गया।

इसके बाद 26 जनवरी 1930 को देशभर में स्वतंत्रता दिवस मनाया गया। कांग्रेस ने ब्रिटिश शासन के अधीन सीमित सुधारों के बजाय पूर्ण स्वतंत्रता की मांग को केंद्र में रखा।

2. साइमन कमीशन का विरोध

1927 में गठित साइमन कमीशन में कोई भारतीय सदस्य नहीं था। इसके कारण भारतीय राजनीतिक नेताओं ने इसका विरोध किया। 1928 में कमीशन के भारत आने पर कई स्थानों पर प्रदर्शन हुए।

इस विरोध ने ब्रिटिश शासन के प्रति असंतोष को बढ़ाया और स्वशासन की मांग को बल दिया।

3. ब्रिटिश सरकार की नीतियों से असंतोष

भारतीयों के सामने राजनीतिक अधिकारों की कमी, आर्थिक कठिनाइयां और औपनिवेशिक कानूनों की समस्या बनी हुई थी। कांग्रेस के कई नेताओं का मानना था कि केवल याचिकाओं और बातचीत से स्वतंत्रता का लक्ष्य हासिल करना कठिन होगा।

इसलिए जनता की भागीदारी के साथ एक व्यापक अहिंसक आंदोलन शुरू करने का निर्णय लिया गया।

4. नमक कर और नमक कानून

नमक हर परिवार की जरूरत था, चाहे व्यक्ति गरीब हो या अमीर। ब्रिटिश सरकार ने नमक के उत्पादन और बिक्री पर नियंत्रण रखा तथा नमक पर कर लगाया।

गांधीजी ने नमक को विरोध का प्रतीक इसलिए बनाया क्योंकि यह आम जनता से जुड़ा मुद्दा था। नमक कानून का उल्लंघन करके आंदोलन को गांवों, कस्बों और शहरों तक पहुंचाया जा सकता था।

5. आर्थिक शोषण का विरोध

विदेशी वस्तुओं के बढ़ते प्रभाव, औपनिवेशिक आर्थिक नीतियों और कर व्यवस्था को लेकर भारतीयों में असंतोष था।

सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान विदेशी कपड़ों का बहिष्कार, स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग और कुछ क्षेत्रों में कर न देने जैसे कार्यक्रमों ने इस असंतोष को राजनीतिक आंदोलन से जोड़ा।

दांडी मार्च क्या था?

दांडी मार्च (Dandi March) सविनय अवज्ञा आंदोलन की सबसे प्रसिद्ध घटना थी। इसे नमक सत्याग्रह या Salt March भी कहा जाता है।

12 मार्च 1930 को महात्मा गांधी अपने 78 स्वयंसेवकों के साथ गुजरात के साबरमती आश्रम से दांडी के लिए पैदल निकले। लगभग 24 दिनों की यात्रा के बाद वे 5 अप्रैल को दांडी पहुंचे और 6 अप्रैल 1930 को समुद्र तट पर नमक बनाकर नमक कानून का उल्लंघन किया।

दांडी मार्च का महत्व केवल नमक बनाने तक सीमित नहीं था। इसने आम नागरिकों को यह संदेश दिया कि वे भी अन्यायपूर्ण कानूनों का शांतिपूर्ण उल्लंघन करके स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान दे सकते हैं।

सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रमुख कार्यक्रम
1. नमक कानून तोड़ना

लोगों ने नमक बनाकर या नमक कानूनों का उल्लंघन करके ब्रिटिश सरकार के एकाधिकार का विरोध किया।

2. विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार

विदेशी कपड़ों और अन्य वस्तुओं का बहिष्कार किया गया। खादी और भारतीय उत्पादों को बढ़ावा दिया गया।

3. कर न देने के अभियान

कुछ क्षेत्रों में किसानों और अन्य समूहों ने भूमि-राजस्व या स्थानीय करों का भुगतान न करने के अभियान चलाए। History Notes इन गतिविधियों का स्वरूप स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग था।

4. वन कानूनों का उल्लंघन

कुछ क्षेत्रों में लोगों ने औपनिवेशिक वन कानूनों का विरोध किया, जिनसे उनके पारंपरिक संसाधनों के उपयोग पर प्रतिबंध लगते थे।

5. धरने और जनसभाएं

लोगों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन, जुलूस और धरने आयोजित किए।History Notes शराब की दुकानों और विदेशी वस्तुओं की दुकानों के सामने भी विरोध प्रदर्शन हुए।

सविनय अवज्ञा आंदोलन में महिलाओं की भूमिका

इस आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से दिखाई दी। महिलाओं ने जुलूसों, धरनों और विदेशी कपड़ों के बहिष्कार में हिस्सा लिया। कई महिलाओं ने नमक सत्याग्रह में भी भाग लिया।

इससे स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की सार्वजनिक और राजनीतिक भागीदारी का विस्तार हुआ। हालांकि सभी क्षेत्रों में उनकी भागीदारी समान नहीं थी।

सविनय अवज्ञा आंदोलन में किसानों और अन्य वर्गों की भूमिका

आंदोलन का प्रभाव अलग-अलग सामाजिक समूहों में अलग तरीके से दिखाई दिया।

  • किसान: कुछ क्षेत्रों में भूमि-राजस्व और स्थानीय करों के विरोध में शामिल हुए।
  • व्यापारी: कई व्यापारियों ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी व्यापार को समर्थन दिया।
  • विद्यार्थी: जुलूसों, प्रचार और राजनीतिक गतिविधियों में भाग लिया।
  • महिलाएं: नमक सत्याग्रह, धरनों और विदेशी कपड़ों के बहिष्कार में शामिल हुईं।
  • आदिवासी समुदाय: कुछ क्षेत्रों में वन कानूनों और औपनिवेशिक नियंत्रण के खिलाफ संघर्ष हुए।

यह ध्यान रखना जरूरी है कि हर वर्ग के आंदोलन में शामिल होने के कारण और अपेक्षाएं एक जैसी नहीं थीं।

गांधी-इरविन समझौता क्या था?

गांधी-इरविन समझौता 5 मार्च 1931 को महात्मा गांधी और तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच हुआ।

इस समझौते के अंतर्गत कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित करने और दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने पर सहमति दी। ब्रिटिश सरकार ने भी कुछ रियायतें स्वीकार कीं, जिनमें अहिंसक राजनीतिक गतिविधियों से जुड़े कई बंदियों की रिहाई और तटीय क्षेत्रों में कुछ शर्तों के तहत नमक बनाने की अनुमति शामिल थी।

इसके बावजूद पूर्ण स्वतंत्रता की मांग स्वीकार नहीं की गई।History Notes इसलिए समझौते को लेकर कांग्रेस के भीतर और अन्य राष्ट्रवादी समूहों में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं।

दूसरा गोलमेज सम्मेलन और आंदोलन की वापसी

1931 में गांधीजी ने लंदन में आयोजित दूसरे गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस का प्रतिनिधित्व किया। सम्मेलन में भारत के संवैधानिक भविष्य पर चर्चा हुई, लेकिन पूर्ण स्वतंत्रता की दिशा में कोई निर्णायक समझौता नहीं हुआ।

भारत लौटने के बाद राजनीतिक परिस्थितियां फिर तनावपूर्ण हुईं और 1932 में सविनय अवज्ञा आंदोलन दोबारा शुरू किया गया। ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तारियों और अन्य दमनात्मक उपायों से इसका सामना किया।

समय के साथ आंदोलन की गति कमजोर हुई और 1934 तक इसका व्यापक चरण समाप्ति की ओर पहुंच गया।

सविनय अवज्ञा आंदोलन का प्रभाव Upsc History Notes Hindi
क्षेत्रप्रमुख प्रभाव
राजनीतिकपूर्ण स्वराज की मांग को व्यापक जनसमर्थन मिला
सामाजिकमहिलाओं, विद्यार्थियों और अन्य समूहों की भागीदारी बढ़ी
आर्थिकविदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी के प्रचार को बल मिला
ग्रामीणकुछ क्षेत्रों में किसानों और वन-आश्रित समुदायों ने स्थानीय मुद्दों पर आंदोलन किया
अंतरराष्ट्रीयदांडी मार्च और नमक सत्याग्रह ने भारत के स्वतंत्रता संघर्ष को व्यापक पहचान दिलाई
राष्ट्रीय आंदोलनअहिंसक कानून-उल्लंघन को जन-आंदोलन की रणनीति के रूप में अपनाया गया
सविनय अवज्ञा आंदोलन की सीमाएं History Notes

आंदोलन ने व्यापक राजनीतिक भागीदारी पैदा की, लेकिन इसके सामने कुछ सीमाएं भी थीं: History Notes

  1. सभी सामाजिक वर्गों और क्षेत्रों की भागीदारी समान नहीं थी।
  2. किसानों, व्यापारियों और अन्य समूहों की मांगें कई बार अलग-अलग थीं।
  3. ब्रिटिश सरकार की गिरफ्तारियों और दमनात्मक कार्रवाइयों ने आंदोलन को प्रभावित किया।
  4. गांधी-इरविन समझौते से पूर्ण स्वतंत्रता हासिल नहीं हुई।
  5. 1932 में आंदोलन दोबारा शुरू होने के बाद इसकी गति पहले जैसी नहीं रही।

इसलिए आंदोलन का मूल्यांकन करते समय इसकी जनभागीदारी और राजनीतिक प्रभाव के साथ-साथ इसकी सीमाओं को भी समझना चाहिए।History Notes

असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन में अंतर History Notes
आधारअसहयोग आंदोलनसविनय अवज्ञा आंदोलन
प्रमुख समय1920–19221930–1934
मुख्य रणनीतिब्रिटिश संस्थाओं से सहयोग समाप्त करनाअन्यायपूर्ण औपनिवेशिक कानूनों का उल्लंघन
प्रमुख घटनाचौरी-चौरा के बाद वापसीदांडी मार्च और नमक सत्याग्रह
प्रमुख राजनीतिक लक्ष्यस्वराजपूर्ण स्वराज
महत्वपूर्ण पड़ावनागपुर कांग्रेस अधिवेशन, 1920लाहौर कांग्रेस, 1929; गांधी-इरविन समझौता, 1931

दोनों आंदोलनों का आधार अहिंसा और जनभागीदारी था, लेकिन उनकी प्रमुख रणनीतियों में अंतर था।

UPSC Prelims के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
  • सविनय अवज्ञा आंदोलन: 1930
  • प्रमुख नेता: महात्मा गांधी
  • पूर्ण स्वराज का लक्ष्य: लाहौर कांग्रेस अधिवेशन, दिसंबर 1929
  • दांडी मार्च शुरू: 12 मार्च 1930
  • नमक कानून तोड़ा गया: 6 अप्रैल 1930
  • गांधी-इरविन समझौता: 5 मार्च 1931
  • दूसरा गोलमेज सम्मेलन: 1931
  • आंदोलन दोबारा शुरू: 1932
  • व्यापक आंदोलन का चरण कमजोर पड़ा: 1934 तक
UPSC Mains में उत्तर कैसे लिखें?

संभावित प्रश्न: “सविनय अवज्ञा आंदोलन के कारणों और भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष पर इसके प्रभावों की चर्चा कीजिए।”

उत्तर की संरचना:

Introduction: 1930 में गांधीजी के नेतृत्व में शुरू हुआ आंदोलन, जिसका उद्देश्य अन्यायपूर्ण औपनिवेशिक कानूनों का अहिंसक उल्लंघन करना था।

मुख्य भाग:

  • पूर्ण स्वराज की मांग
  • साइमन कमीशन का विरोध और औपनिवेशिक नीतियों से असंतोष
  • नमक कानून और दांडी मार्च
  • विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार
  • महिलाओं, किसानों और अन्य वर्गों की भागीदारी
  • गांधी-इरविन समझौता और आंदोलन की सीमाएं

Conclusion: आंदोलन ने स्वतंत्रता की मांग को व्यापक जनभागीदारी से जोड़ा और औपनिवेशिक शासन को अहिंसक चुनौती देने की रणनीति को मजबूत किया। History Notes

सविनय अवज्ञा आंदोलन याद रखने की Trick History Notes

“पूर्ण स्वराज → नमक सत्याग्रह → दांडी मार्च → गांधी-इरविन समझौता → आंदोलन दोबारा शुरू”

याद रखने वाली मुख्य Dates:

1929 → 1930 → 1931 → 1932 → 1934

  • 1929: पूर्ण स्वराज
  • 1930: दांडी मार्च
  • 1931: गांधी-इरविन समझौता
  • 1932: आंदोलन दोबारा शुरू
  • 1934: व्यापक आंदोलन का चरण कमजोर पड़ा
निष्कर्ष History Notes

सविनय अवज्ञा आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण चरण था। 1930 के दांडी मार्च और नमक सत्याग्रह ने ब्रिटिश सरकार के कानूनों को खुले तौर पर चुनौती देने का एक अहिंसक तरीका प्रस्तुत किया। आंदोलन ने किसानों, महिलाओं, विद्यार्थियों और अन्य समूहों को अलग-अलग रूपों में स्वतंत्रता संघर्ष से जोड़ा।History Notes

हालांकि इससे तत्काल पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हुई, लेकिन इसने पूर्ण स्वराज की मांग, जनभागीदारी और अहिंसक प्रतिरोध को राष्ट्रीय आंदोलन के केंद्र में बनाए रखने में योगदान दिया।